यूँ ही बस इधर-उधर विचरना मन का


डायरी के पन्नों में क्या कुछ आ जाता है..कई बार उसकी कोई खास वज़ह नहीं होती, यूँ ही बस इधर-उधर विचरना मन का...कोई सन्दर्भ- प्रसंग नहीं..बिलकुल ही उन्मुक्त....उनमे से कुछ आपके समक्ष...

किस्मत से मै भिखारी हूँ 
और किस्मत से ही मुझे 
भीख मिलती है. वरना 
'आगे बढ़ो' की सीख मिलती है..!!!








सिद्धांत एक ऐसा पुरुष है, जिसे कभी भी एक पतिव्रता नहीं मिलती..!!!


 "जान लेकर करता है 
खामोशी की शिकायत 
दर्द की बात लिखता है 
दर्द देने वाला.."


४.  "ख़ता तब से शुरू हो गयी बेइंतिहा  
    आजमाना जबसे जनाब ने शुरू किया.."


देखें; 'श्रीश उवाच' पर- कि;

चित्र साभार:गूगल 

18 comments:

अजय कुमार ने कहा…

आपके मन का विचरन बहुत सटीक है

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

"....जब स्वयं की यायावरी वृत्ति जगी तो पाया खुद को अरावली की पहाड़ियों के बीच अठखेलियाँ करते हुए..जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय, दिल्ली..अभी शोधरत हूँ यहाँ शायद किसी नए फलसफे के लिए... "

श्रीश जी पहली बार नजर आपके इन उपरोक्त शब्दों पर गई, पिछले कुछ चंद समय में जहां तक मैं आपको समझ पाया, पढने की कोशिश की, नितांत ही बहुत उत्तम विचारों के युवा हो ! बस एक निवेदन है कि जेनयु की परम्परा और इतिहास के मुताविक अपने बिचारो को ज्यादा "लाल " मत बनने देना ! मैं यह नहीं कह रहा कि लाल बन्ना बुरा है, उसकी भी बहुत सी अच्छाईयां थी, मगर अब उनका कोई ख़ास महत्व धरातल पर नजर नहीं आता ! मेरे शब्द अच्छे न लगे तो क्षमा ! कविता बहुत सुन्दर और सार गर्भित है !

Udan Tashtari ने कहा…

"जान लेकर करता है
खामोशी की शिकायत
दर्द की बात लिखता है
दर्द देने वाला..

-आह!! क्या बात है भई!!!

Amrendra Nath Tripathi ने कहा…

'' ख़ता तब से शुरू हो गयी बेइंतिहा
आजमाना जबसे जनाब ने शुरू किया.."
.... हर एक बार यही बात सताती है तुम्हे ?
जय मुक्तकिया ...

Dr. Shreesh K. Pathak ने कहा…

आदरणीय गोदियाल साहब आशीर्वाद दीजिये !! और निश्चिंत रहिये..वैसे ऐसा भी जे.एन.यू. लाल नहीं. ये एक बात बस जम सी गयी है. इस पर कभी विस्तार से लिखूंगा...!
आभार..!!!

शरद कोकास ने कहा…

हर कोई आगे जाओ आगे जाओ कहता है कितना आगे जायें ?

निर्मला कपिला ने कहा…

जान लेकर करता है
खामोशी की शिकायत
दर्द की बात लिखता है
दर्द देने वाला.."
श्रीश जी बहुत सही बात कही है सुन्दर और सार्गर्भित रचना है देर से आयी माफी चाहती हूँ शुभकामनायें

अपूर्व ने कहा…

भई आपकी डायरी के बारे मे देख कर तो लगता है कि ब्लॉगिंग बहुत पहले ही शुरू कर चुके थे आप..पेपर पर..
हाँ किस्मत की जरूरत भिखारी से ज्यादा किसी को नही होती है..ऐसा मेरा मानना है..और मुफ़्त मे तो ’सीख’ भी मिल जाय तो बुरा नहीं...और इतिहास बताता है कि अक्सर एकपत्नीव्रती लोगों को ही पतिव्रता पत्नी नही मिलती..फिर फ़टीचर सिद्धांत को तो शादी के ही लाले पड़ जाते हैं..आज के जमाने मे..तो पतिव्रता स्त्री बस उसकी बहन हो सकती है..बस !!..आपकी बाद की दोनो प्रविष्टियाँ किन्ही खास क्षणों की उससे भी खास अनु्भूतियों की उपज लगती हैं..सो कमेंट नही कर सकता.. :-)

padmja sharma ने कहा…

श्रीश
दर्द देने वाले मुखर और पाने वाले अक्सर मौन हो जाते हैं .

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Randhir Singh Suman ने कहा…

thanks

kshama ने कहा…

किस्मत से मै भिखारी हूँ
और किस्मत से ही मुझे
भीख मिलती है. वरना
'आगे बढ़ो' की सीख मिलती है..!!!

Kya baat hai..khoobsoorat rachna aur khayalaat!

www.SAMWAAD.com ने कहा…

Adbhut Bhav.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

""जान लेकर करता है
खामोशी की शिकायत
दर्द की बात लिखता है
दर्द देने वाला.."

आ...हा...क्या कह गए श्रीश जी ....!!

Sandesh Dixit ने कहा…

किस्मत से मैं भिखारी .......we call it free will ...........देवताओ से कुछ अलग,इंसान की प्रवर्ति
wordpress से blogspot पर आया हूँ एक रचना के साथ...पढ़े और टिपण्णी दे !!!

Crazy Codes ने कहा…

achha vicharan hai... usse bhi achhi lagi "aage badho" kee seekh...

अपूर्व ने कहा…

अरे श्रीश भई नववर्ष पर नयी दैनिंदिनी नही खरीदी क्या..कितना लम्बा वक्त हो गया..या दैनिंदिनी के बाजार मे डिस्काउंट रेट पर जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं :-)

Dr. Shreesh K. Pathak ने कहा…

सही कहा.

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